है कोई जवाब? : किसकी जुबान बोल रहे हैं इस देश के पिछड़े?
Fri, Dec 12, 2025
नवल किशोर कुमार
कोई कितना सभ्य है, यह उसकी जुबान भी तय करती है। हालांकि यह एकमात्र कसौटी नहीं है। लेकिन एक अहम कसौटी तो है ही। मैं इस बात को केंद्रीय अमित शाह से नहीं जोड़ रहा जिन्होंने अभी दो दिन पहले संसद में ‘साला’ शब्द का प्रयोग किया। मैं इस बात बिहार के गृहमंत्री सम्राट चौधरी से नहीं जोड़ रहा, जिनकी उपलब्धि का मूल आधार ही लालू प्रसाद व उनके परिजनों को गालियां देना रहा है। मैं यह सोच रहा हूं कि आखिर इस देश के पिछड़े किसकी जुबान बोल रहे हैं। क्या वजह है कि भाषागत मर्यादाएं बार-बार तोड़ी जा रही हैं। हालत तो यह है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक इस मर्यादा का उल्लंघन करते हैं और सवर्ण मुस्कुराते हैं।
खैर, यह बात केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। आम जनों के जीवन में भी भाषा का असर होता है। मैं तो यह देख रहा हूं कि पूरे देश में संस्कृत को फिर से स्थापित करने की कोशिशें की जा रही हैं। संसद में ‘वंदे मातरम’ के ऊपर चर्चा हुई। मकसद यही कि संस्कृत में रची गई इस कविता को आधुनिक समय में भी प्रासंगिक बनाया जाए। वैसे तो यह बंगाल में होनेवाले चुनाव से प्रेरित लगता है, लेकिन बात केवल यही नहीं है। इसे ऐसे भी समझिए कि मोदी के दिमाग में ‘वंदे मातरम’ की बात आरएसएस के कारण आई। यह आरएसएस ही चाहता है कि इस देश में संस्कृत स्थापित हो, ताकि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का उसका सपना साकार हो।
वर्ष 2025 आरएसएस की स्थापना का सौवां साल है। इन सौ वर्षों में आरएसएस ने खुद को इतना ताकतवर तो बना ही लिया है कि वह जिसे चाहे उसे इस देश का शासक बना सकता है। उसके लिए पिछड़े वर्ग से आनेवाले मोदी महज प्यादे भर हैं। और इस कारण हैं क्योंकि इस देश में पिछड़ा वर्ग सबसे बड़ा समुदाय है और इसलिए भी कि पिछड़े वर्ग के लोग आपस में बंटे हुए हैं। इनकी कोई सामूहिक पहचान नहीं है। पिछड़ा के रूप में उसकी एक पहचान बन सकती है, जैसा कि डॉ. लोहिया ने कहा था कि ‘पिछड़ा पावे सौ में साठ’। लेकिन डॉ. लोहिया पिछड़ों की बात करते-करते आरएसएस की गोद में खेलने लगे, यह तो अतीत ने देखा है। अतीत ने यह देखा है कि कांग्रेस विरोध की राजनीति के लिए उन्होंने आरएसएस और जनसंघ से भी गुरेज नहीं किया। आज भी नीतीश कुमार, जिन्होंने अपना सियासी सफर समाजवादी के रूप में प्रारंभ किया था, बाद में केवल अपनी जाति और आरएसएस के प्यादे बनकर रह गए हैं। उनके लिए पिछड़ा महज सियासी पत्ता है। कभी किसी जाति को पिछड़ा वर्ग से निकालकर अति पिछड़ा में डाल देते हैं तो कभी किसी अति पिछड़ी जाति को अनुसूचित जाति की सूची में।
असल में आज के पिछड़े सवर्णों की जुबान बोल रहे हैं। और सवर्णों ने अपनी जुबान बदल ली है। सवर्ण चाहते हैं कि पिछड़े संस्कृत पढ़ें, हिंदी पढ़ें और वे स्वयं अंग्रेजी पढ़ें ताकि रोजगार के बेहतर अवसरों पर उनका कब्जा हो। वे पिछड़ों को अंग्रेजी से दूर कर देना चाहते हैं, यह एक तरह से उनके वर्चस्व को बनाए रखने का तरीका है, जिसे पिछड़े समझना ही नहीं चाहते। और थोड़ी बहुत अंग्रेजी जो पिछड़े समाज के बच्चों को पढ़ाई जाती है, उसमें भी षड्यंत्र है। भारतीय अंग्रेजी सवर्णों की अंग्रेजी है। इसके दायरे में पिछड़ा समाज है नहीं।
इसे ऐसे समझिए कि ‘ए’ से ‘एप्पल’ पढ़ाया जाता है जबकि ‘एग्रीकल्चर’ भी पढ़ाया जा सकता है। ऐसे ही जैसे ‘सी’ से ‘काऊ’ पढ़ाया जाता है, वैसे ही ‘बी’ से ‘बॉल’ की जगह ‘बफैलो’ भी पढ़ाया जा सकता है। हिंदी में भी ‘क’ से ‘कबूतर’ के बदले ‘कुदाल’ और ‘ख’ से ‘खरगोश’ के बदले ‘खुरपी’ के बारे में पढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवर्ण चाहते ही नहीं हैं कि पिछड़ों का बौद्धिक विकास हो। इसलिए वे पिछड़ों की भाषा और उनकी संस्कृति को उनसे दूर करते रहे हैं। वर्तमान में भी कर रहे हैं और सत्ता के शीर्ष पर काबिज हैं।
कल एक कविता जेहन में आई–
चमार, दुसाध, पासी, यादव,
कुड़मी, नोनिया, बिंद,और
कहारों के खेतों में
कोई देवता खेत नहीं जोतता
कोई देवता बीज नहीं बोता
कोई देवता पानी नहीं पटाता
कोई देवता निकउनी नहीं करता
कोई देवता फसल नहीं काटता
कोई देवता दौनी नहीं करता
कोई देवताइन अनाज नहीं फटकती
कोई देवताइन कोठी नहीं बनाती।
सब काम ये खुद करते हैं
और' पुरखों के 'सवा सेर अनाज' के बदले
ऋण चुकाते हैं।
जगदीश महतो (मास्टर साहब) : सामंतों से मिले अपमान के कारण जिन्होंने अपनी जवान पत्नी का सिंदूर पोंछवा दिया था
Wed, Dec 10, 2025
दुर्गेश कुमार
कुछ नायक वैसे होते हैं जो जबरिया कलम से गढ़े जाते हैं। कुछ नायक वैसे होते हैं जो त्याग और बलिदान से अमिट छाप छोड़ जाते है, और कलम के चितेरे उन्हें पन्ने पर उतारने की कोशिश करते है।
आज हम उस नायक की बात करेंगे जिसके बारे में कलम तो चला लेकिन उसकी चर्चा का दायरा सीमित है। ऐसा लगता है कि इस नायक को एक बड़ा वर्ग खलनायक के रुप में देखता है। शायद इसलिए बङे बङे साहित्यकारों का पात्र होने के बावजूद इस नायक की चर्चा बहुत कम होती है।
जिसने सामंतों से मिले अपमान के घूंट पीने से इन्कार करते हुए अपनी जवान पत्नी से कहा कि तुम अपनी मांग का सिंदूर पोंछ दो। क्योंकि जिसके पति के प्रतिष्ठा का हनन होता है वो औरत विधवा की तरह ही होती हैं।
इतना सुनते ही उस क्रान्तिकारी पुरुष की क्रान्तिकारी महिला ने अपनी मांग से सिंदूर पोछ लिया।
कभी कभी यह समाज बहुत निर्मम हो जाता है। वह भुला देता है अपने नायकों को.. वह मोल नहीं समझता है अपने योद्धाओं को.. जबकि उनके बलिदान के बदौलत ही यह समाज खुली हवा में सांस ले रहा होता है।
देश आजाद होने के समाज की दशा स्वतः नहीं सुधरी। इसके लिए हजारों लोगों के कीमत चुकाई है।
ऐसे ही एक शख्स का नाम है जगदीश महतो उर्फ़ जगदीश मास्टर। जिसने पूरी जिंदगी गरीबों के अधिकार और हक के लिए जिया। वह 37 साल की उम्र में अपनी मौत को गले लगाया ताकि अपनी जान बचाने के लिए उसके हाथों से अन्याय न हो।
वह भोजपुर जो दो तरफ से गंगा और सोन से घिरा हुआ है। 1960 के दशक में भोजपुर और बक्सर एक ही जिले थे। ब्लॉक 16 थे। भोजपुर की आबो हवा में सामंतवाद से सिसकती हुई आवाजें थी, सूखा और अकाल था।
भोजपुर का एक ब्लॉक सहार आरा शहर से 40 किलोमीटर दूर सामंती मिजाज के लिए कुख्यात था। यह भोजपुर का वह इलाका है जहां दलितों की आबादी अन्य क्षेत्रों के मुकाबले अधिक है।
इसी ब्लॉक में एक गांव है जिसे एकवारी कहते हैं।
इसी गांव में कोयरी समाज के किसान परिवार में जन्मे जगदीश महतो पढ़ाई और शारीरिक कद काठी में औसत थे। जगदीश मास्टर रोज अपने गांव और आसपास के जुल्म की कहानियां देखते थे।
सामंती सोच के दबंग लोग गरीबों, कमजोरों की बहु बेटियों की प्रतिष्ठा का हनन करते, जोर जबदस्ती करते, देख सुन जगदीश महतो के युवा मन में विद्रोही जन्म ले रहा था। उन दिनों खेतों में जबरन मजदूरी के लिए मजबूर करना आम बात थी।
जगदीश महतो आरा में रहकर पढाई पूरी कर रहे है। गांव वापस आते तो सामंती जुल्म की कहानियां सुनकर व्यथित हो जाते थे।
जगदीश मास्टर के बारे में कम लिखा गया है। किन्तु महाश्वेता देवी ने अपनी पुस्तक मास्टर साब में उनकी कहानी की झलक मिल जाती हैं।
जब सामंतवाद की दलदल में फंसे भोजपुर के एकवारी गाव में दलितों, वंचितों, गरीबों की बहु बेटियां की अस्मिता तार तार हो रहीं थीं तब युवक जगदीश महतो के दिमाग में विद्रोह पनप रहा था।
स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद वो जैन स्कूल आरा में विज्ञान के शिक्षक नियुक्त हुए। जगदीश मास्टर गांव आते तो रामेश्वर अहीर बार-बार ताने मारते की पढ़ाई किस लिए हो अपने लोगों को छोड़कर चले जाओगे। उधर बचपन से ले कर जवानी तक जगदीश महतो ने कई ऐसी घटनाओं को देखा था जिसकी वजह से उनके मन का विद्रोही बार बार दहाड़ लगाता था।
ऐसे में ही 1967 के चुनाव में सहार विधानसभा से कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार थे एकवारी पंचायत के मुखिया रामनरेश राम। राम नरेश राम को समर्थन के लिए पढ़े लिखे जगदीश मास्टर जो वक्ता भी थे का साथ मिल गया। सामंत जगदीश मास्टर से और चिढ़े हुए थे।
जबकि अगड़ी जातियों के समर्थन से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की तरफ से उम्मीदवार थे राजदेव राम।
इस चुनाव में एकवारी गांव में अगड़ी जातियों के लोग बूथों को कब्ज़ा करने की सभी नीयत से जमा हुए थे। लेकिन इसकी खबर पाकर सभी बूथों पर कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थक भी जमा हुए थे।
एकवारी के दबंग नथुनी सिंह ने जब यह देखा कि कहीं कोई चारा न चल रहा है तो अपने सभी लठैत को लेकर एक ही बूथ पर जमा हुआ। और बंदूक का भय दिखा कर वोटरों को हटा कर फर्जी वोट डालने लगा।
खबर पहुंचते ही जगदीश मास्टर अपने एक साथी लोहा चमार के साथ पहुंचे। नथुनी सिंह को इसी का इंतजार था। जगदीश मास्टर पर लाठियों की बरसात कर दी गई। वो नीचे गिर पड़ते हैं।
लोहा चमार चिल्ला रहा था कि कौन हाथ लगा कर निकल जायेगा। तब इधर से भी लोग लाठियां चला ने लगे। नथुनी सिंह के लोगो की भी धुनाई हुईं।
लेकिन मास्टर साहब बेहोश खून से लथपथ थे। अस्पताल ले जाया गया। हाथ पांव और सीने की हड्डियां टूट चुकी थी। शरीर नीला पड़ गया था।
डाक्टर ने कहा कि यह बच नहीं सकता है। पांच माह तक अस्पताल में रहने के बाद जगदीश मास्टर बच गए। चुनाव में रामनरेश राम जीत चुके थे।
.......
साल 1968 था। आरा शहर ने एक शाम में एक जुलूस को अपनी गलियों से गुजरते हुए देखा। गरीब और दलितों की हाथों में जलती मशाले थीं। और उस जुलूस का नेतृत्व कर रहे थे मास्टर साब के नाम से चर्चित जगदीश महतो उर्फ जगदीश मास्टर। जुलूस में शामिल लोग नारा लगा रहे थे- हरिजनिस्तान लेके रहेंगे।
पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी की घटना के बाद नक्सली गतिविधियां बिहार में भी तेजी से बढ़ रही थी। मास्टर साहब जान-बूझकर विदाउट टिकट ट्रेन में यात्रा करके पकड़े गए, ताकि जेल में नक्सलियों से मुलाकात हो सके।
अपनी जवानी गरीबों के हक के लिए कुर्बान कर दिया। तारीख़ 10 दिसंबर 1972 कस्बा बिहिया। अनाज मंडी में दबंग धाना सिंह अपनी फसल बेचने के लिए आया था। सामंती मिजाज का धाना सिंह पर गरीबों का उत्पीड़न, महिलाओं की मान मर्यादा को तार तार करने का गुनाह था। कहते हैं कि पुलिस प्रशासन भी उस पर कार्रवाई नहीं कर पाती थी।
जगदीश महतो यानी मास्टर साहब ने सबक सिखाने के लिए बिहिया की अनाज मंडी की तरफ ट्रक से एक लिफ्ट लेकर अपने साथी रामायण राम के साथ बिहिया मंडी पहुंचते हैं। अनाज मंडी के पास उस दबंग धाना सिंह के सीने में पिस्तौल की गोलियां दाग़ कर काम तमाम कर देते हैं।
फ़िर वो वापस लौटने के लिए बाग बागीचे का रास्ता पकड़ते हैं। किसी ने हल्ला किया चोर चोर, डकैत.. घटना स्थल से तकरीबन 700 मीटर वापस लौटे ही होंगे कि मुशहर जाति के लोग उनका पीछा करने लगे।
आगे आगे मास्टर साहब और उनके साथी रामायण राम... और पीछे पिछे मुशहर जाति के लोगों की भीड़।
अचानक एक व्यक्ति रास्ते के बीचों बीच सामने से आकर पकड़ लेता है। रामायण राम अपनी गोलियां उसके सीने में दाग देते हैं।
तब तक मुशहर जाति के दर्जन भर लोगों की भीड़ उनकी तरफ लठी डंडों के साथ बढ़ रही थी।
कामरेड रामायण राम ने पिस्तौल तानी तो जगदीश मास्टर ने कहा कि गोली मत चलाओं। इन्ही लोगों के हक के लिए हम लड़ रहे हैं, आज अपनी जान के लिए इन पर गोली चलायेंगे.. यह स्वीकार नहीं हैं।
रामायण राम ने पिस्तौल नीचे कर लिया। मुशहर जाति के लोगो की भीड़ अपने नायक की तरफ बढ़ी जिसका नाम तो वो सुने थे लेकिन चेहरे से अंजान थे।
भीड़ ने अपने ही नायक पर लाठियों की प्रहार किया। फ़िर अनगिनत लाठियों के प्रहार से जगदीश मास्टर और रामायण राम की मौत हो गई।
लाश बिहिया थाना में गया तो तहकीकात में पता चला कि यह शव सामंतवाद का काल बन कर उभरे जगदीश मास्टर का है।
लाठियां चलाने वाले मुशहरों की बस्ती में चीत्कार गूंज उठा। चूल्हा उपास रहा। अफसोस के आंसू फूट पड़े कि कि यह कौन सा पाप हो गया। जो हमारी लड़ाई लड़ता था हमने अनजाने उसी की हत्या कर दी। मुशहर की बस्ती में शोक की लहर छा गई।
पुलिस मार डालती, कोई जमींदार मार डालता तो कोई दुख नहीं होता। लेकिन उन्हें उन लोगों ने मार डाला। उनके अपने ही लोगों ने।
बाद में उसी बस्ती में 10 दिसंबर 2012 को जगदीश मास्टर के स्मारक के लिए मुशहर समुदाय के एक व्यक्ति ने ज़मीन दिया। जिस पर एक स्मारक है।...स्मारक पर धूल उड़ते हैं।
संयोगवश, 10 दिसंबर 1935 को ही कॉमरेड जगदीश का जन्म सहार प्रखंड के एकवारी गांव में हुआ था।
धन बनाम आत्मसम्मान : सवाल 10 हजार रुपये के पुरस्कार का...
Fri, Dec 5, 2025
श्रीपति सिंह
भारत में ब्रिटिश राज के समय एक ब्रिटिश अफ़सर ने एक भारतीय युवक के चेहरे पर जोरदार थप्पड़ मारा। तुरंत ही युवक ने भी अपनी पूरी ताकत से उस ब्रिटिश अफ़सर को इतना ज़ोरदार थप्पड़ मारा कि अफ़सर ज़मीन पर गिर पड़ा।
इस अपमान से स्तब्ध होकर अफ़सर सोचने लगा – एक साधारण भारतीय युवक कैसे उस साम्राज्य के सेना अधिकारी को थप्पड़ मार सकता है जिसके बारे में कहा जाता है कि उस साम्राज्य में सूरज कभी अस्त नहीं होता।
वह तुरंत अपनी पोस्ट पर गया और उस भारतीय को कड़ी सज़ा देने की मांग की लेकिन उच्च पदस्थ कमांडर ने उसे शांत करते हुए कहा – उस भारतीय युवक को सज़ा नहीं, बल्कि पुरस्कार देना चाहिए। और पुरस्कार के रूप में उसे दस हज़ार रुपये उपहार में देने चाहिए।
अफ़सर ने घृणा से चिल्लाकर कहा – यह सिर्फ मेरा या आपका नहीं, बल्कि ब्रिटिश महारानी का भी अपमान है। और आप कह रहे हैं कि उसे सज़ा देने की बजाय उसे पुरस्कार दिया जाए!
कमांडर ने दृढ़ आवाज़ में कहा – यह एक सैन्य आदेश है और तुम्हें इसे बिना देर किए पालन करना होगा। जूनियर अफ़सर को कमांडर का आदेश मानना पड़ा। वह दस हज़ार रुपये लेकर उस भारतीय युवक के पास गया और बोला – कृपया मुझे माफ़ कर दें और इस दस हज़ार रुपये को उपहार के रूप में स्वीकार करें।
भारतीय युवक ने उपहार स्वीकार कर लिया और भूल गया कि उसे अपनी ही धरती पर एक उपनिवेशवादी अफ़सर के हाथों थप्पड़ खाना पड़ा था।
उस समय दस हज़ार रुपये बहुत बड़ी रकम थी। उसने उस धन का सही उपयोग किया और कुछ वर्षों में अपनी ज़िंदगी सुधार कर काफी संपन्न हो गया।
पहले वह एक साधारण युवक था, लेकिन अब समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति बन चुका था।
कई वर्षों बाद वही अंग्रेज़ कमांडर अपने जूनियर अफ़सर को बुलाकर बोला – क्या तुम्हें वह भारतीय याद है जिसने तुम्हें थप्पड़ मारा था?अफ़सर ने कहा – वह अपमान मैं कैसे भूल सकता हूँ?
कमांडर ने कहा – अब समय आ गया है। तुम उसे ढूंढो और सबके सामने जाकर उसे ज़ोरदार थप्पड़ मार कर आओ! अफ़सर बोला – यह कैसे संभव है? जब वह गरीब था तब उसने पलटवार किया। अब जब वह अमीर हो चुका है तो वह मुझे मार ही डालेगा।
कमांडर ने कहा – मैं जो कह रहा हूं, वही करो। यह भी तुम्हारे ऊपर आदेश है। जूनियर अफ़सर को आदेश का पालन करना पड़ा। वह उस भारतीय युवक के पास गया और उसे ज़ोर से थप्पड़ मारा।
लेकिन इस बार बिल्कुल उल्टा हुआ। भारतीय युवक ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। यहां तक कि वह हिम्मत करके अफ़सर की ओर देखने तक की स्थिति में नहीं था।
अफ़सर हैरान होकर वापस कमांडर के पास पहुंचा। कमांडर ने पूछा – मैं तुम्हारे चेहरे पर आश्चर्य देख रहा हूँ। तुम इतने हैरान क्यों हो?
अफ़सर ने कहा – जब वह गरीब था तब उसने पलटकर वार किया था। लेकिन आज जब वह संपन्न है तो वह आंख उठाकर देखने तक की हिम्मत नहीं कर पाया। यह कैसे संभव है?
अंग्रेज़ कमांडर ने धीमी आवाज़ में कहा – पहली बार उसके पास उसकी इज़्ज़त के अलावा कुछ नहीं था। वह उसे सबसे मूल्यवान समझता था और उसकी रक्षा के लिए वह जान जोखिम में डालकर भी लड़ गया।
लेकिन अब उसने उसकी रक्षा नहीं की, क्योंकि अब उसके पास उसकी इज़्ज़त से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका धन है।
जिस दिन उसने दस हज़ार रुपये उपहार में स्वीकार किए, उसी दिन उसने अपनी आत्मसम्मान और इज़्ज़त को रुपये के आगे बेच दिया।
और जब इंसान का आत्मसम्मान बिक जाता है, तो उसकी रीढ़ की हड्डी भी झुक जाती है।
आत्मसम्मान बनाए रखें। पद, उपहार या किसी लालच में खुद को बेचने के बजाय अपनी रीढ़ सीधी रखें।
नोट:- इस घटना का बिहार में चुनाव के ठीक पहले महिलाओं को दिए गए 10 हजार रुपये से या अन्य किसी से कोई लेना-देना नहीं है।