Wed 18 Mar 2026
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सुचना

है कोई जवाब? : किसकी जुबान बोल रहे हैं इस देश के पिछड़े?

नवल किशोर कुमार

कोई कितना सभ्य है, यह उसकी जुबान भी तय करती है। हालांकि यह एकमात्र कसौटी नहीं है। लेकिन एक अहम कसौटी तो है ही। मैं इस बात को केंद्रीय अमित शाह से नहीं जोड़ रहा जिन्होंने अभी दो दिन पहले संसद में ‘साला’ शब्द का प्रयोग किया। मैं इस बात बिहार के गृहमंत्री सम्राट चौधरी से नहीं जोड़ रहा, जिनकी उपलब्धि का मूल आधार ही लालू प्रसाद व उनके परिजनों को गालियां देना रहा है। मैं यह सोच रहा हूं कि आखिर इस देश के पिछड़े किसकी जुबान बोल रहे हैं। क्या वजह है कि भाषागत मर्यादाएं बार-बार तोड़ी जा रही हैं। हालत तो यह है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक इस मर्यादा का उल्लंघन करते हैं और सवर्ण मुस्कुराते हैं।

खैर, यह बात केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। आम जनों के जीवन में भी भाषा का असर होता है। मैं तो यह देख रहा हूं कि पूरे देश में संस्कृत को फिर से स्थापित करने की कोशिशें की जा रही हैं। संसद में ‘वंदे मातरम’ के ऊपर चर्चा हुई। मकसद यही कि संस्कृत में रची गई इस कविता को आधुनिक समय में भी प्रासंगिक बनाया जाए। वैसे तो यह बंगाल में होनेवाले चुनाव से प्रेरित लगता है, लेकिन बात केवल यही नहीं है। इसे ऐसे भी समझिए कि मोदी के दिमाग में ‘वंदे मातरम’ की बात आरएसएस के कारण आई। यह आरएसएस ही चाहता है कि इस देश में संस्कृत स्थापित हो, ताकि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का उसका सपना साकार हो।

वर्ष 2025 आरएसएस की स्थापना का सौवां साल है। इन सौ वर्षों में आरएसएस ने खुद को इतना ताकतवर तो बना ही लिया है कि वह जिसे चाहे उसे इस देश का शासक बना सकता है। उसके लिए पिछड़े वर्ग से आनेवाले मोदी महज प्यादे भर हैं। और इस कारण हैं क्योंकि इस देश में पिछड़ा वर्ग सबसे बड़ा समुदाय है और इसलिए भी कि पिछड़े वर्ग के लोग आपस में बंटे हुए हैं। इनकी कोई सामूहिक पहचान नहीं है। पिछड़ा के रूप में उसकी एक पहचान बन सकती है, जैसा कि डॉ. लोहिया ने कहा था कि ‘पिछड़ा पावे सौ में साठ’। लेकिन डॉ. लोहिया पिछड़ों की बात करते-करते आरएसएस की गोद में खेलने लगे, यह तो अतीत ने देखा है। अतीत ने यह देखा है कि कांग्रेस विरोध की राजनीति के लिए उन्होंने आरएसएस और जनसंघ से भी गुरेज नहीं किया। आज भी नीतीश कुमार, जिन्होंने अपना सियासी सफर समाजवादी के रूप में प्रारंभ किया था, बाद में केवल अपनी जाति और आरएसएस के प्यादे बनकर रह गए हैं। उनके लिए पिछड़ा महज सियासी पत्ता है। कभी किसी जाति को पिछड़ा वर्ग से निकालकर अति पिछड़ा में डाल देते हैं तो कभी किसी अति पिछड़ी जाति को अनुसूचित जाति की सूची में।

असल में आज के पिछड़े सवर्णों की जुबान बोल रहे हैं। और सवर्णों ने अपनी जुबान बदल ली है। सवर्ण चाहते हैं कि पिछड़े संस्कृत पढ़ें, हिंदी पढ़ें और वे स्वयं अंग्रेजी पढ़ें ताकि रोजगार के बेहतर अवसरों पर उनका कब्जा हो। वे पिछड़ों को अंग्रेजी से दूर कर देना चाहते हैं, यह एक तरह से उनके वर्चस्व को बनाए रखने का तरीका है, जिसे पिछड़े समझना ही नहीं चाहते। और थोड़ी बहुत अंग्रेजी जो पिछड़े समाज के बच्चों को पढ़ाई जाती है, उसमें भी षड्यंत्र है। भारतीय अंग्रेजी सवर्णों की अंग्रेजी है। इसके दायरे में पिछड़ा समाज है नहीं।

इसे ऐसे समझिए कि ‘ए’ से ‘एप्पल’ पढ़ाया जाता है जबकि ‘एग्रीकल्चर’ भी पढ़ाया जा सकता है। ऐसे ही जैसे ‘सी’ से ‘काऊ’ पढ़ाया जाता है, वैसे ही ‘बी’ से ‘बॉल’ की जगह ‘बफैलो’ भी पढ़ाया जा सकता है। हिंदी में भी ‘क’ से ‘कबूतर’ के बदले ‘कुदाल’ और ‘ख’ से ‘खरगोश’ के बदले ‘खुरपी’ के बारे में पढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवर्ण चाहते ही नहीं हैं कि पिछड़ों का बौद्धिक विकास हो। इसलिए वे पिछड़ों की भाषा और उनकी संस्कृति को उनसे दूर करते रहे हैं। वर्तमान में भी कर रहे हैं और सत्ता के शीर्ष पर काबिज हैं।

कल एक कविता जेहन में आई–

चमार, दुसाध, पासी, यादव,

कुड़मी, नोनिया, बिंद,और

कहारों के खेतों में

कोई देवता खेत नहीं जोतता

कोई देवता बीज नहीं बोता

कोई देवता पानी नहीं पटाता

कोई देवता निकउनी नहीं करता

कोई देवता फसल नहीं काटता

कोई देवता दौनी नहीं करता

कोई देवताइन अनाज नहीं फटकती

कोई देवताइन कोठी नहीं बनाती।

सब काम ये खुद करते हैं

और' पुरखों के 'सवा सेर अनाज' के बदले

ऋण चुकाते हैं।

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