कुर्मी समाज के लोगों जागो : सत्तासीनों की अंधभक्ति करोगे तो वे आपको समझेंगे पैरों की धूल
Patelon ki Baaten
Thu, Dec 18, 2025
दुर्गेश कुमार
जो समाज सत्तासीनों के पीछे अंधभक्ति में लगा होता है उसे सत्ता में काबिज लोग पैरों के धूल समझते हैं। किंतु जो समाज अपनी सिविल सोसाइटी के बताए गए रास्ते पर रहता है, उस समाज के लोगों को सत्ता सलामी करती है।
यह टिप्पणी विशेषकर कुर्मी समाज के बारे में ही है। हालांकि कई ऐसी जातियां है, जिसका चरित्र इसके जैसा ही है और हालत भी। इस समाज में तमाम अच्छाइयां हैं किंतु सबसे बुरी चीज यह है कि इस समाज की चेतना का नियंत्रण कोई बौद्धिक वर्ग नहीं करता बल्कि राजनीतिक वर्ग ही करता है। कोई भी राजनीतिक वर्ग कुर्सी के लिए झूठ बोल देता है, अपनी आकांक्षाओं के लिए सामाजिक चेतना पर गर्म पानी डाल देता है। लेकिन किसी भी समाज की सिविल सोसाइटी ऐसा करे, यह कम ही देखा गया है।
यानी आप विधायक हो गए, सांसद हो गए, मंत्री हो गए तो आपको इस समाज में सुना जाएगा... आपका मान सम्मान होगा.. भले ही आपकी बौद्धिक क्षमता न्यूनतम हो।...आप अपनी बौद्धिक शक्ति से समाज की चेतना को टस से मस नहीं कर सकते हैं... किंतु यदि आपके पास सत्ता की ताकत हो तो लोग आपके हाथों-हाथ ले लेते हैं। यह लक्षण उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों राज्यों के कुर्मी समाज में देखा जा सकता है।
अब दलित भाईयों की सिविल सोसाइटी है।...किसी भी राजनीतिक स्तम्भ से ज्यादा ताकतवर है। ब्राह्मणों और भूमिहारों की सिविल सोसाइटी है, पहले से ही वह सर्वशक्तिमान है। किंतु मध्यवर्ती जातियों की सिविल सोसाइटी न के बराबर है। जो लोग है, उनको इस समाज के लोग रद्दी भर भाव नहीं देते हैं।
सिविल सोसाइटी अर्थात जो प्रबुद्ध वर्ग व्यक्तिगत लाभ को दरकिनार कर जन मुद्दों के लिए अपनी राय रखता हो, जरूरी एक्शन लेता हो।
कई बार देखा जाता है कि इस समाज द्वारा आयोजित कार्यक्रम का विषय बौद्धिक वर्ग का है, किंतु उसमें मुख्य अतिथि राजनीतिक वर्ग से है। युवा नेता बनना चाहते है, लेकिन अध्येयता नहीं। अपनी जाति के विधायकों और सांसदों को मसीहा मान लेते हैं। हर कार्यक्रमों में विधायक और सांसद को बुलाते है, कभी यह नहीं हुआ कि कोई एकेडमिक, बिजनेसमैन, टेक्नोक्रेट या इकोनॉमिस्ट की खोज हो।.. कभी नहीं! ऐसे में सिविल सोसाइटी का कैसे होगा?
ऐसी स्थिति में कोई सिविल सोसाइटी उभर नहीं पाती है। आप डॉक्टर हो, पत्रकार हो, वकील हो, आपको भी प्रबुद्ध मान लिया जाता है। जबकि यह प्रोफेशन मात्र है। बुद्धिजीवी के नाम पर अमीरों को बुला लिया जाता है। किसी भी समाज में इनोवेटिव आइडिया वाले लोगों की कमी नहीं है। असल कमी है कि ऐसे लोगों और समाज के बीच संवाद की कमी।
प्रबुद्ध होने का पेशे से उच्चतम होना जरूरी नहीं है। प्रबुद्ध का बहुत अधिक पढ़ा लिखा होना भी जरूरी शर्त नहीं है। प्रबुद्ध वो है जो समाज में परिवर्तन के लिए विचार करता है और उस पर एक्शन लेता है।
किंतु ऐसे लोग समाज के विमर्श को प्रभावित नहीं कर पाते हैं। बहुत सारे लोग डर और संकोच से अपनी बात नहीं रख पाते हैं। क्योंकि उसकी स्वीकार्यता नहीं है। हम चाहते हैं कि यह हिचक टूटे। इस समाज के प्रबुद्ध लोग आगे आए। अपनी बातों और विचारों से समाज को दिशा दें।
दूसरा पहलू यह भी है कि आप कितने भी मेधावी हो, समाज के लिए कितनी भी व्यापक दृष्टि रखते हो.. योगदान देते हो...किंतु समाज आपके साथ नहीं खड़ा होता है, बल्कि लाल बत्ती लगी गाड़ियों के पीछे खड़ा होता है। जब लाल बत्ती वाले देखते हैं कि अंधा हो कर यह तो हमारा ही सुनता है तो अपने तरीके से निर्णय लेते हैं और समाजहित की चिंता नहीं करते हैं। किंतु वोट मांगने के लिए आपके पास समाज के नाम पर चले जाते हैं। इसका नुकसान यह होता है कि वह समाज दोराहे पर होता है।
कोई भी राजनीतिक शक्ति की जड़ में किसी न किसी सामाजिक शक्ति की ताकत होती है। यदि राजनीतिक शक्ति समाजिक शक्ति का मान मर्दन करने लगे तो समाज का दायित्व है कि उस राजनीतिक शक्ति का विकल्प तैयार करें। बरगद के पेड़ों का होना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि बरगद की कीमत जमीन को बंजर हो कर चुकाना नहीं पड़े। यह बात कहने का साहस सिविल सोसाइटी के पास होता है, यह दुर्गेश कुमार कह सकता है। वोटों की तिजारत करने वाले किसी भी शख्स से ऐसा सुनने की उम्मीद मत करिए।
(लेखक सामाजिक चिंतक हैं।)
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