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सुचना

लोधी समाज पूछ रहा यह सवाल : लखनऊ के राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल से प्रधानमंत्री के भाषण में कल्याण सिंह क्यों गायब रहे?

Patelon ki Baaten

Sat, Dec 27, 2025

एड. ब्रजलाल लोधी

लखनऊ में भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई जी की जयंती के अवसर पर माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल का उद्घाटन किया गया। इस अवसर को भारतीय राजनीति की वैचारिक परंपरा से जोड़ते हुए अटल बिहारी वाजपेई जी, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की प्रतिमाओं की स्थापना की गई। यह पहल निश्चित रूप से प्रेरणादायक मानी जा सकती है।

किन्तु इसी लखनऊ से एक ऐसा प्रश्न भी उठ खड़ा हुआ है, जिसने उत्तर प्रदेश के लोधी समाज को गहरी पीड़ा और असंतोष में डाल दिया है—

प्रधानमंत्री के पूरे संबोधन में जननायक स्वर्गीय कल्याण सिंह जी का नाम क्यों नहीं लिया गया?

कल्याण सिंह जी केवल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं थे, बल्कि वह उस दौर के प्रतीक थे जब भारतीय जनता पार्टी प्रदेश में संघर्ष कर रही थी। उन्होंने न केवल पार्टी को राजनीतिक स्थायित्व दिया, बल्कि वैचारिक दृढ़ता भी प्रदान की। अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के निर्णायक चरण में उनका नेतृत्व ऐतिहासिक रहा। यह तथ्य देश और दुनिया जानती है कि कठिन परिस्थितियों में उन्होंने सत्ता की परवाह किए बिना अपने निर्णय लिए।

इसके बावजूद यह लगातार सामने आता रहा है कि—

राम मंदिर निर्माण समिति में कल्याण सिंह जी को स्थान नहीं दिया गया।

मंदिर उद्घाटन कार्यक्रम में उनका उल्लेख नहीं हुआ।

अयोध्या में प्रस्तावित उनकी प्रतिमा आज तक स्थापित नहीं की गई।

और अब लखनऊ की उनकी कर्मभूमि में बने राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल पर भी उनकी प्रतिमा नहीं है। यह चिंता का विषय है।

यह उपेक्षा किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पिछड़े समाज की भी है, जिससे कल्याण सिंह जी आते थे और जिसका प्रतिनिधित्व उन्होंने किया। यही कारण है कि यह विषय अब केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान और राजनीतिक समावेशन का प्रश्न बन गया है।

प्रधानमंत्री जी ने अपने संबोधन में उत्तर प्रदेश के कई पिछड़े और दलित समाज के महापुरुषों का उल्लेख किया, किंतु कल्याण सिंह जी का नाम न आना लोधी समाज को यह सोचने पर विवश करता है कि क्या उसके योगदान को धीरे-धीरे राजनीतिक स्मृति से बाहर किया जा रहा है?

उत्तर प्रदेश में लगभग 12 प्रतिशत लोधी समाज 150 से अधिक विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाने की क्षमता रखता है। केवल लखनऊ जनपद में ही इस समाज की आबादी लगभग 15 लाख और मतदाता संख्या 5 लाख से अधिक है। इसके बावजूद लोधी समाज को आज तक भारतीय जनता पार्टी में न तो अपेक्षित राजनीतिक भागीदारी मिली और न ही उसके ऐतिहासिक नेतृत्व को वह सम्मान प्राप्त हुआ, जिसका वह अधिकारी है।

यह स्थिति एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती है— क्या लोधी समाज को केवल चुनावी समय में याद किया जाता है? क्या उसके नेताओं, इतिहास और आत्मसम्मान का कोई संस्थागत महत्व नहीं है?

यह प्रसंग लोधी समाज के उन नेताओं के लिए जो विधायक और सांसद के रूप में भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक दिशा दे रहे हैं के लिए भी आत्ममंथन का अवसर है, जो वर्षों से पार्टी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं, किंतु समाज के सम्मान और हिस्सेदारी के प्रश्न पर मुखर नहीं हो पाए। यदि समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता वास्तविक है, तो उन्हें यह विचार करना होगा कि उनकी भूमिका केवल मतदाता जुटाने तक ही क्यों सीमित रह जाती है।

इन परिस्थितियों में जिला लोधी क्षत्रिय राजपूत सभा, लखनऊ ने प्रधानमंत्री जी का पूरा संबोधन सुनने के बाद गहरी पीड़ा और असहजता का अनुभव किया है। संगठन इस विषय पर होने वाली अपनी आगामी बैठक में इन घटनाक्रमों पर गंभीर विचार-विमर्श करेगा और समाज की भावनाओं के अनुरूप आगे की दिशा तय करेगा।

लोधी समाज अब यह स्पष्ट रूप से महसूस कर रहा है कि सम्मान केवल नारों से नहीं, बल्कि स्मरण, प्रतिनिधित्व और सहभागिता से मिलता है।

यदि यह संतुलन नहीं बना, तो राजनीतिक विश्वास का क्षरण स्वाभाविक है।

लखनऊ से उठता यह प्रश्न केवल एक समाज का नहीं, बल्कि उस समावेशी राजनीति की कसौटी है, जिसकी बात बार-बार की जाती रही है।

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