Wed 18 Mar 2026
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सुचना

क्या भगवान वास्तविक है? : विज्ञान, धर्म और आधुनिक समाज में तर्कशीलता की लंबी लड़ाई

लाला बौद्ध

मृत्यु जब पास आती है, तो क्या सचमुच भगवान याद आने लगता है? क्या शरीर के कमजोर पड़ते ही आत्मा किसी अदृश्य शक्ति की तलाश करने लगती है? या यह सिर्फ एक सामाजिक-conditioning है, जिसे सदियों से हमारे भीतर भरा गया है—इतना गहरा और इतना व्यवस्थित कि अंतिम सांस तक हम उसके प्रभाव से बाहर नहीं आ पाते?

यह सवाल आज के समय में और भी सख्त हो जाता है, क्योंकि हम 2025–26 की दुनिया में खड़े हैं—जहाँ विज्ञान, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) मानव इतिहास की सबसे बड़ी छलांगें लगा चुकी हैं। ऐसे समय में यह पूछना न सिर्फ उचित है, बल्कि अनिवार्य है कि क्या आज भी धर्म को आँख मूँदकर मानना आवश्यक है? धर्म आखिर है क्या? किसने बनाया? और क्यों बनाया?

हमारे सामाजिक ढांचे में ये सवाल अक्सर असहज कर देते हैं। लेकिन तर्क की दुनिया में असहजता एक स्वस्थ लक्षण है। आज की इस चर्चा में हमारे साथ हैं कवि, वैज्ञानिक और सामाजिक आलोचक श्री गौहर रज़ा, जिनकी दृष्टि इस उलझी हुई बहस को एक वैचारिक स्पष्टता देती है।

विज्ञान और भगवान का प्रश्न: दो भिन्न संसार

श्री रज़ा का मानना है कि “क्या ईश्वर है?” यह विज्ञान का प्रश्न नहीं है।

यह एक अनुभवजन्य या प्रयोगशाला-आधारित सवाल नहीं हो सकता। विज्ञान प्रमाण चाहता है—देखने, मापने और दोहराने योग्य प्रमाण। ईश्वर का विचार प्रत्यक्ष नहीं बल्कि काल्पनिक है, और विज्ञान काल्पनिकताओं को तब तक स्वीकार नहीं करता जब तक उनके लिए प्रमाण न मिल जाएं।

विज्ञान यह न सिद्ध कर सकता है कि ईश्वर है, न यह सिद्ध कर सकता है कि ईश्वर नहीं है।

यही कारण है कि ईश्वर का प्रश्न दर्शन और मनोविज्ञान के दायरे में आता है—साइंस के दायरे में नहीं।

लेकिन रज़ा साहब की व्यक्तिगत स्थिति स्पष्ट है,

वे किसी अलौकिक शक्ति में विश्वास नहीं रखते।

वे कहते हैं:

“यदि कोई सर्वशक्तिमान सत्ता है और वह दुनिया भर में हो रहे अत्याचारों को रोक सकती है लेकिन नहीं रोकती, तो मैं उसकी पूजा नहीं कर सकता। मैं तो उससे नफरत कर सकता हूँ।”

यह विचार धार्मिक भावुकता पर तर्क की रोशनी डालता है। यदि भगवान सर्वज्ञ भी है, सर्वशक्तिमान भी है, और दयालु भी है—तो दुनिया इस कदर अन्याय से भरी कैसे है?

धर्म इस सवाल का उत्तर “भगवान की लीला” या “कर्मों का फल” कहकर देता है।

विज्ञान कहता है—ये सब मानव समाज और इतिहास की संरचनाएँ हैं; किसी अदृश्य शक्ति का खेल नहीं।

धार्मिक conditioning: जन्म से मृत्यु तक ‘इंडॉक्ट्रिनेशन’ की प्रक्रिया

समाज में धर्म एक व्यक्तिगत आस्था नहीं रह गया है; यह एक सांस्कृतिक और राजनीतिक संरचना बन चुका है।

बच्चा जन्म लेता है और उसे पहली बार दूध से पहले धार्मिक संस्कार मिलते हैं।

पहली बार आँख खोलता है—घर में पूजा की घंटियाँ।

बाहर निकले—मंदिर, मस्जिद, गिरजा।

स्कूल जाए—धार्मिक प्रतीक।

टीवी देखे—धार्मिक धारावाहिक।

मोबाइल खोले—भगवा/इस्लामी reels।

मरे—तो अंतिम संस्कार धार्मिक रीति से।

यह जीवन की पूरी यात्रा पर एक प्रकार की धार्मिक ‘कारपेट बॉम्बिंग’ है।

यह मान लेते हैं कि धर्म व्यक्ति की पसंद है, लेकिन सच यह है कि धर्म पसंद नहीं, थोपे गए पैकेज का नाम है।

बच्चे को यह विकल्प नहीं दिया जाता कि वह बड़ा होने के बाद चाहे तो किसी धर्म में रहे, चाहे तो किसी में न रहे।

वह उस परिवार, उस जाति, उस संस्कृति और उस धार्मिक पहचान में जन्म लेता है—और वही उसकी “पहचान” बना दी जाती है।

यहीं से इंडॉक्ट्रिनेशन शुरू होता है।

धर्म का बाजार: आस्था का औद्योगिक मॉडल

जहाँ भी भीड़ है, वहाँ बाजार है।

जहाँ भी डर है, वहाँ कोई न कोई व्यापारी लाभ कमा रहा है।

धर्म की दुनिया एक विशाल उद्योग बन चुकी है—जिसमें:

• मंदिर/मस्जिद/गुरुद्वारे का विस्तार,

• गुरु-बाबाओं का साम्राज्य,

• चमत्कारों का व्यापार,

• जड़ी-बूटियों और ‘ऊर्जा’ उत्पादों के MLM नेटवर्क,

• और राजनीतिक संरक्षण—सब शामिल है।

आध्यात्मिक बाजार का मॉडल बहुत सरल है:

डर बेचो + समाधान बेचो = पैसा

जब भय “नरक” का हो, “कर्मफल” का हो, “ग्रहों की शांति” का हो—तो समाज का एक बड़ा हिस्सा बिना सवाल किए अपनी जेब खोल देता है।

आज देश में कई “धार्मिक ब्रांड” ऐसे हैं जिनकी संपत्ति से हर सरकारी स्कूल के बच्चे को एक साल की छात्रवृत्ति दी जा सकती है।

लेकिन यह धन समाज को लौटता नहीं—बल्कि और अधिक तंत्र, और अधिक अंधविश्वास पैदा करने में लग जाता है।

धर्म-उद्योग तीन तरह के लोगों के सहारे चलता है:

1. खरीदे गए लोग – जिन्हें धन व सुविधा देकर प्रचारक बनाया जाता है।

2. सच्चे विश्वासी – जो भोलेपन में इस मशीनरी के ईंधन बन जाते हैं।

3. सार्थक/स्वार्थी लोग – जो धार्मिक संस्थानों को काला धन सफेद करने और राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग करते हैं।

धर्म बनाम विज्ञान: यह टकराव क्यों होता है?

धर्म और विज्ञान को अक्सर एक-दूसरे के विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

लेकिन यह विरोध असल में उनके स्वभाव और तरीके के अंतर के कारण है।

1. धर्म पूछता है—“क्यों?

विज्ञान पूछता है—“कैसे?”

धर्म का अंतिम उत्तर होता है—“यह ईश्वर की इच्छा है।”

विज्ञान का अंतिम उत्तर होता है—“यह प्राकृतिक नियमों से संचालित है।”

2. धर्म में पुराना ज्ञान पवित्र है।

विज्ञान में सबसे नया ज्ञान सबसे सटीक।

धर्म सुधार या संशोधन को खतरा मानता है।

विज्ञान सुधार को ही प्रगति मानता है।

3. धर्म साक्ष्य नहीं, विश्वास मांगता है।

विज्ञान विश्वास नहीं, साक्ष्य मांगता है।

4. धर्म सवालों को सीमित करता है।

विज्ञान सवालों को विस्तार देने के लिए प्रेरित करता है।

इसीलिए इतिहास गवाह है कि धर्म के नाम पर हुए युद्ध, हिंसा, साम्प्रदायिक दंगे, सामाजिक विभाजन, सभी सत्य को दबाने, प्रश्न पूछने से रोकने और सत्ता को कायम रखने के औजार रहे हैं।

अंधविश्वास और वैज्ञानिक पड़ताल

भारत में अंधविश्वास सिर्फ धार्मिक दायरों में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आदत बन चुका है।

ज्योतिष हो, वास्तु हो, ग्रहों का प्रकोप, पिछले जन्म की यादें, चमत्कार, इन सब पर वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि इनमें कोई तार्किक आधार नहीं है।

• ग्रहों की स्थिति का मानव चरित्र या भविष्य पर कोई वैज्ञानिक प्रभाव नहीं।

• राशिफल मनोवैज्ञानिक भ्रम होता है—बरनम/फॉरर इफेक्ट।

• चमत्कार प्रकाश, छाया, भ्रम या चालाकी का खेल।

• पुनर्जन्म का कोई प्रमाण विश्व में अब तक नहीं मिला।

• टाइम ट्रैवल में अतीत में जाना अभी भी भौतिक रूप से असंभव।

समस्या यह है कि हम इन सब को “परंपरा” के नाम पर पवित्र मान लेते हैं और विज्ञान को “पश्चिमी साज़िश” बताने में लग जाते हैं।

नास्तिक बनाम आस्तिक: दो दृष्टियाँ, दो जिम्मेदारियाँ

नास्तिक कौन?

• जो किसी अलौकिक शक्ति में विश्वास नहीं करता,

• जो अपने कर्मों की जिम्मेदारी खुद लेता है,

• और जिसे यह पता होता है कि हमें अभी बहुत कुछ नहीं पता।

नास्तिकता अहंकार नहीं, ज्ञान की विनम्रता है।

आस्तिक कौन?

• जो किसी पुस्तक या गुरु द्वारा बताए गए “शाश्वत सत्य” में विश्वास करता है,

• और जिसे यह लगता है कि ब्रह्मांड के बारे में अंतिम सत्य पहले ही लिखा जा चुका है।

आज कहा जाता है कि मृत्यु के करीब आते ही लोग ईश्वर को याद करते हैं।

लेकिन यह एक सार्वभौमिक सत्य नहीं।

रज़ा साहब बताते हैं कि उनके पिता जीवन भर नास्तिक रहे—अंतिम दिन तक।

स्वयं वे भी नास्तिक ही हैं।

यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि उनके घर में सवाल पूछने की आज़ादी थी—वह आज़ादी जिसे हमारा समाज आमतौर पर बच्चों से छीन लेता है।

आधुनिक भारत और तर्कशीलता की चुनौती

मीडिया, खासकर टेलीविज़न और सोशल मीडिया, आज अंधविश्वास फैलाने के सबसे बड़े औजार बन चुके हैं।

हर चैनल पर ज्योतिषाचार्य, लाइव चमत्कार, टोटके, ग्रहों की शांति—सब कुछ परोसा जा रहा है।

युवा पीढ़ी वैज्ञानिक सोच से जितनी दूर की जा रही है, उतना ही देश अपनी वास्तविक क्षमता खो रहा है।

भारत का वैज्ञानिक इतिहास—आर्यभट्ट से लेकर बोस और रमण तक—हमारे तर्क पर आधारित ज्ञान का गौरवपूर्ण प्रमाण है। लेकिन यह इतिहास आज धार्मिक मिथकों की धूल में दबाया जा रहा है।

भविष्य की राह: किस तरह का समाज चाहिए?

अगर हमें एक परिपक्व, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील समाज बनाना है, तो कुछ मूलभूत कदम उठाने होंगे:

1. बच्चों को सोचने की आज़ादी देना

धर्म किसी व्यक्ति की इच्छा से अपनाया जाए—जन्म से नहीं थोप दिया जाए।

2. शिक्षा में वैज्ञानिक तर्क, इतिहास और दर्शन का विस्तार

सिर्फ विज्ञान नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रसार।

3. धर्म और राजनीति के गठजोड़ को तर्क से चुनौती देना

क्योंकि धार्मिक उन्माद का लाभ सबसे ज्यादा सत्ता को मिलता है, समाज को नहीं।

4. मीडिया में अंधविश्वास के प्रचार को सीमित करना

यह एक बड़ी नीति-स्तरीय चुनौती है।

5. समाज को बताना कि संदेह पाप नहीं—सृजन का साधन है

प्रश्न से डरने वाला समाज कभी स्वतंत्र नहीं हो सकता।

निष्कर्ष: आशा कहां है?

रज़ा साहब की पुस्तक Myths to Science युवाओं के बीच खूब पढ़ी जा रही है।

यह एक महत्वपूर्ण संकेत है कि इस देश का युवा अब भी सवाल पूछना चाहता है।

धर्म-उद्योग जितनी भी कोशिश करे, वैज्ञानिक तर्कशीलता की लौ अब बुझने वाली नहीं है।

धर्म और विज्ञान दो बिल्कुल अलग रास्ते हैं।

विज्ञान प्रकृति के नियमों को समझने का तरीका है।

धर्म मानव इतिहास की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति।

दोनों को गड्ड-मड्ड करने से फायदा किसी गुरु या सत्ता को होता है—समाज को नहीं।

यदि हम एक बेहतर दुनिया बनाना चाहते हैं, तो हमें बच्चों से लेकर युवाओं तक में सवाल पूछने की आदत जगानी होगी—और एक ऐसा वातावरण तैयार करना होगा जहाँ वे बिना डर, बिना अपराधबोध, बिना सामाजिक दबाव के सोच सकें, निर्णय ले सकें, और विज्ञान व मानवता के बीच संतुलन बना सकें।

यही वह दिशा है जिसमें हम एक तर्कसंगत, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील समाज बना सकते हैं।

और शायद—यही वह दिशा है जिसमें इंसान अपनी वास्तविक क्षमता पहचान सकता है, बिना किसी अदृश्य सत्ता के भय और प्रलोभन के।

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